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Sunday, January 22, 2017

पत्नी से 10,000 रूपये कर्ज लेकर भारतीय साफ्टवेयर जगत की दशा और दिशा तय करते हुए खड़ी की 2 लाख करोड़ की कंपनी

पत्नी से 10,000 रूपये कर्ज लेकर भारतीय साफ्टवेयर जगत की दशा और दिशा तय करते हुए खड़ी की 2 लाख करोड़ की कंपनी

यह कहानी है देश के एक दिग्गज उद्योगपति की जिन्होनें दुनिया को दिखा दिया है यदि आप मे आत्मविश्वास है, कुछ कर गुजरने की क्षमता है, तो सफ़लता हमेशा आपके कदम चूमेगी। भारतीय साफ्टवेयर उद्योग की दशा और दिशा तय करते हुए इस शख्स ने अपनी प्रतिभा और मेहनत की बदौलत एक ऐसी कम्पनी का निर्माण किया, जो आज दुनिया के गिनी चुनी कम्पनियों के समकक्ष खड़ा है। विदेशों मे भी अपनी कंपनी का बोलबाला कायम कर इस शख्स ने सफलता की नयी परिभाषा गढ़ी और अन्य भारतीय कम्पनियों के सामने मिसाल पेश करते हुए उन्हें बताया कि पूरी दुनिया के दरवाजे हमारे लिए खुले हुए है।

हम बात कर रहें हैं भारतीय साफ़्टवेयर उद्योग के प्रणेता दिग्गज बिजनेसमैन नागवार रामाराव नारायणमूर्ति के बारे में। भारत में साफ्टवेयर उद्योग की बात होते ही नारायणमूर्ति और उनकी कम्पनी इन्फ़ोसिस का जिक्र सर्वप्रथम होता है। कर्नाटक के कोलर जिले के एक मध्यम-वर्गीय परिवार में जन्में नारायणमूर्ति बचपन से ही बेहद प्रतिभाशाली थे। शुरुआत से ही सूचान प्रौद्योगिकी में अधिक दिलचस्पी की बदौलत इन्होनें नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंजीनियरिंग में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन की।

ग्रेजुएशन करने के बाद भी इन्होनें अपनी पढ़ाई जारी रखी और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपूर से मास्टर डिग्री प्राप्त कर ली। इसके बाद नारायणमूर्ति ने अपने कैरियर की शुरुआत पुणे के एक छोटे आईटी कंपनी से की। कुछ दिनों तक यहाँ काम करने के बाद उन्होंने भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद से जुड़े रहे। पुणे में काम करने के दौरान ही उनकी मुलाकात सुधा मूर्ति से हुई, जो आज उनकी धर्मपत्नी हैं। ऊँची सोच और हमेशा कुछ नया करने की चाह रखने वाले नारायणमूर्ति अपनी खुद की कंपनी शुरू करना चाहते थे, लेकिन कारोबार को शुरू करने के लिए पूंजी सबसे बड़ी चुनौती थी।

नारायणमूर्ति ने कंपनी खोलने की अपनी इक्षा को पत्नी के साथ साझा किया। पत्नी ने उनकी ऊँची सोच की सराहना करते हुए उन्हें दस हज़ार रूपये उधार देने को राजी हो गई। नारायणमूर्ति ने अपने हिस्से के शेयर के पैसे लगाकर छह अन्य साथियों के साथ साल 1981 मे इन्फ़ोसिस की आधारशिला रखी।

मुम्बई के एक अपार्टमेंट में शुरू हुई इस कंपनी को नारायणमूर्ति ने दिन-रात की मेहनत से एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में तब्दील किया। नारायणमूर्ति अपनी दूर-दृष्टि से कुछ बड़ा करने की चाह में हमेशा नए-नए प्रयोग किये। इन्फोसिस में काम करते समय उन्होंने भारतीय आईटी के विकास के लिये वैश्विक स्तर पर चलने वाले एक मॉडल्स का निर्माण किया। उनकी कड़ी मेहनत रंग लाई और साल 1990 में इन्फोसिस पब्लिक लिमिटेड कम्पनी मे तब्दील हुई।

नारायणमूर्ति साल 1981 से 2002 तक इन्फोसिस की सीईओ बनकर सेवा की और बाद में उन्होंने अपने सह-संस्थापक नंदन निलेकनी को पद का उत्तराधिकारी बनाया। साल 2002 से 2006 तक वे बोर्ड के चेयरमैन थे, बाद में वे बोर्ड और मुख्य सलाहकार समिति के भी चेयरमैन बने। इतना ही नहीं नारायणमूर्ति ने HSBC बैंक, DBS बैंक, यूनिलीवर, आईसीआईसीआई बैंक और NDTV के लिए डायरेक्टर के रूप में कार्य किया।

नारायणमूर्ति ने न सिर्फ इन्फोसिस को एक बहुराष्ट्रीय कंपनी बनाई बल्कि उन्होंने भारत में आईटी क्षेत्र का विकास करने के उद्देश से कई मॉडल्स का विकास किया। उन्होंने इन्फोसिस की तरक्की दिखा अन्य लोगों को भी आईटी क्षेत्र में पड़ी अपार संभावनाओं से भी अवगत कराया। इसमें कोई शक नहीं है कि उनके अथक प्रयासों से भारतीय आईटी उद्योग ने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई।

नारायणमूर्ति को बेहद ही साधारण जीवन जीने वाले इंसान के रूप में जाना जाता है। उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा देश के सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान पद्मश्री और पद्म विभूषण से नवाजा जा चुका है। इसके अलावा उन्हें तकनीकी क्षेत्र में तमाम पुरस्कार समय-समय पर मिलते रहे।

दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति वॉरेन बफेट की राह चलते हुए नारायणमूर्ति और उनकी पत्नी सुधा मूर्ति ने अपनी कुल निजी संपत्ति में से करीब 4000 करोड़ रुपया दान में देने का फैसला किया है। मूर्ति और उनकी पत्नी सुधा उन लोगों की आर्थिक मदद करना चाहते हैं जो बेसिक हेल्थकेयर, बेसिक एजुकेशन और बेसिक न्यूट्रीशन के क्षेत्र में कार्य करते हैं।

एक मुमकिन असंभावना एक निश्चित सम्भावना की तुलना में बेहतर है। इन्ही विचारों से अपनी जिंदगी की शुरुआत करने वाले नारायणमूर्ति ने असम्भव को सम्भव कर दिखाया। अपनी काबिलियत से भारत के इतिहास के सुनहरे पन्नों में अपना नाम लिखने वाले नारायणमूर्ति पीढ़ी-दर-पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बनें रहेंगें।

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