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जानिये कैसे बिज़नेस स्टार्टअप्स कुछ ही वर्षो में आपको बना सकते हैं करोड़पति

जानिये कैसे बिज़नेस स्टार्टअप्स कुछ ही वर्षो में आपको बना सकते हैं करोड़पति

टाटा, बिरला और अम्बानी जैसे कारोबारी परिवार भारत में अथाह संपत्ति के प्रतिक है। इन परिवारों को इतनी संपत्ति हासिल करने के लिए कई दशक लगे है। हाल के वर्षो में हमने देखा है कि युवा उद्यमी महज कुछ ही वर्षो में स्टार्टअप के जरिये कई करोड़ रुपये की संपत्ति बना लेते है। ज्यादातर मामलों में उद्यमी अपनी कंपनियों के मुनाफा करने से पहले ही करोड़ो के मालिक बन जाते है। कैसे बनते हैं स्टार्टअप चलाने वाले युवा उद्यमी इतने कम समय में करोड़ो रुपये के मालिक? क्या है इनका सीक्रेट फार्मूला? जानिये आगे की स्लाइड/पैरा में।

एक स्टार्टअप के शुरुआत से आर्थिक ताकत हासिल करने के सफर में कुछ पड़ाव है। हम एक-एक कर इन पड़ावों के बारे में जानकारी दे रहें हैं।
पहला पड़ाव (पार्ट १)
सबकुछ एक आईडिया से स्टार्ट होता है। जितना उम्दा आईडिया होगा उतना ही आसान उसे आगे ले जाने का सफर रहेगा। हालांकि जिस आईडिया से उद्यमी शुरुआत करते है उसमें समय के साथ बड़े परिवर्तन की जरुरत होती है लेकिन शुरुआती आईडिया सबसे ज्यादा महत्व रखता है।
जब किसी व्यक्ति के पास कोई बिज़नस आईडिया होता है और बिज़नस करने इच्छा होती है तब वह व्यक्ति इस आईडिया को अपने करीबी लोगो से साझा करते है। यह करीबी लोग ही इस बिज़नस के शुरुआती समर्थक होते है। ये लोग इस आईडिया पर काम करने के लिए शुरुआती इन्वेस्टमेंट और अन्य सहायता देते हैं। इस सहायता में प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए तकनिकी तथा प्रबंधकीय सहायता भी होती है।

कंपनी को शुरुआती समय से ही बेहतर बनाने के लिए एक कंपनी बनायी जाती है और उसे कानूनी तरीके से पंजिकृत किया जाता है। यह कंपनी एक पार्टनरशिप कंपनी या फिर एक लिमिटेड कंपनी हो सकती है। बेहतर स्वरुप और प्रबंधकीय व्यवस्था पाने के लिए आम तौर पर कंपनी लिमिटेड पंजीकृत की जाती है। विभिन्न देशो में कंपनी पंजीकरण के कानून है। भारत में कंपनीज़ एक्ट २०१३ के तहत कंपनिया पंजीकृत की जाती है। पंजीकरण के बाद कंपनी में साझेदारी के अनुसार शेयर्स दिए जाते हैं। पंजीकरण के बाद कंपनिया प्राइवेट लिमिटेड या फिर लिमिटेड प्रत्यय जोड़ती है। अमेरिका में यही inc. के तौर पर जानी जाती है।
कंपनी के पंजीकरण के समय तय किया हुआ शेयर होल्डिंग अनुपात बहुत मायने रखता है। अगर कंपनी में शुरुआती इन्वेस्टर ने १० लाख रुपये इन्वेस्टमेंट की है, और उस इन्वेस्टर के अलावा कंपनी के दो प्रमोटर्स है। इन दो प्रमोटर्स ने कंपनी के ६० प्रतिशत शेयर्स अपने पास रखे है और इन्वेस्टर को उसके १० लाख इन्वेस्टमेंट के लिए ४० प्रतिशत शेयर्स देने का फैसला किया है, ऐसी स्थिति में कंपनी की एक्चुअल वैल्यूएशन २५ लाख रुपये हो जायेगी और दो प्रमोटर्स द्वारा रखे गए ६० प्रतिशत शेयर्स की वैल्यू १५ लाख हो जायेगी। इस पहले इन्वेस्टमेंट को सीड-फंडिंग कहा जाता है। ऐसे पहले ही पड़ाव में बिना कोई पैसे इन्वेस्ट किये प्रमोटर्स अपने शेयर्स की वैल्यू १५ लाख तक कर लेते है। यह कैलकुलेशन हर केस में अलग-अलग होगा और आम तौर आज-कल समय में यह वैल्यू कई करोड़ों में होती है।
दूसरा पड़ाव (पार्ट २)

पहले पड़ाव में मिली हुई सीड फंडिंग की रकम शुरुआती बिज़नस डेवलपमेंट के लिए इस्तेमाल की जाती है। यह शुरुआती समय हर कंपनी के लिए अलग-अलग होता है पर आमतौर पर यह समय ६ से लेकर २४ महीनो तक हो सकता है। इस समय में प्रमोटर्स अपने कंपनी के सर्विसेज और प्रोडक्ट्स को बेहतर करते है। इस दौरान प्रोडक्ट्स एवं सर्विसेज को छोटे मात्रा में बेचा भी जाता है और शुरुआती कस्टमर बेस तैयार किया जाता है। इस समय कोशिश की जाती है कि इस प्रोजेक्ट के लिए यूजर्स के मन में एक उत्साह तैयार किया जा सके। साथ ही इस प्रोडक्ट या सर्विस को बड़े पैमाने पर लॉच करने की तैयारी की जाती है। अब आगे बढ़ने के लिए और लागत की जरूरत होती है। सीड फंडिंग के समय प्रमोटर्स के जान-पहचान के लोग छोटी रकम इंवेट्स करते है पर अब बड़े रकम की जरूरत होती है। इस को सीरीज ‘ए’ फंडिंग कहा जाता है। इस राउंड के लिए प्रमोटर्स वेंचर फंड्स और एंजेल इन्वेस्टर्स को संपर्क करते है। वेंचर फंड्स वह कंपनिया होती है जो औरों से इन्वेस्टमेंट इकट्टा करके स्टार्टअप प्रोजेक्ट्स में इन्वेस्ट करती है। एंजेल इन्वेस्टर्स वो इन्वेस्टर्स होते है जो पहले अपने स्टार्टअप में से पैसा काम चुके होते है या फिर किसी बड़े कंपनी में काम कर चुके होते है। इनके द्वारा दी गयी रकम बड़ी होती है और साथ ही इनके अनुभव और कॉन्टेक्ट्स का फायदा बिज़नस को मिलता है। नए इन्वेस्टमेंट को लाने के लिए कंपनी के कैपिटल को बढाया जाता है। कंपनी अपनी जरूरत के अनुसार कैपिटल बढ़ा सकती है।
सीड फंडिंग से अलग सीरीज़ ए राउंड में शेयर्स की वैल्यूएशन प्री-मनी और पोस्ट-मनी वैल्यूएशन द्वारा निर्धारित की जाती है। एक तरफ जहां प्रमोटर्स ज्यादा प्री-मनी वैल्यूएशन पर जोर देते है, वहीँ दूसरी तरफ इन्वेस्टर्स ज्यादा पोस्ट-मनी वैल्यूएशन पर जोर देते है। इस समय पर अगर कंपनी की प्री-मनी वैल्यूएशन १ करोड़ तय की जाती है और नए इन्वेस्टर्स ४०० लाख इन्वेस्ट करने वाले है तोह उन्हें ४० प्रतिशत शेयर्स मिलेंगे। इस राउंड के बाद प्रमोटर्स के शेयर्स की वैल्यू ६० लाख हो जायेगी और सीड राउंड में इन्वेस्ट करने वाले इन्वेस्टर की वैल्यू ४० लाख हो जायेगी। इस तरह दुसरे पड़ाव के बाद कंपनी प्रमोटर्स की वैल्यूएशन ६० लख तक पहुँच गयी है और इन्होंने इसके लिए कोई इन्वेस्टमेंट नहीं की है।

सीरीज ‘ए’ की तर्ज पर आगे और राउंड्स फंडिंग ली जा सकती है और इन राउंड्स को बी, सी, डी राउंड्स कहा जाएगा। हर राउंड के बाद कंपनी की और कंपनी के शेयर्स की वैल्यूएशन बढ़ जाती है।

तीसरा पड़ाव (पार्ट ३ )

जैसे-जैसे कंपनी आगे बढाती है, वैसे ही और लोगो की रूचि कंपनी में बढती है। प्रमोटर्स के पास यह ऑप्शन होता है कि वे अपने सारे शेयर्स बेच कर कंपनी छोड़ दे। इस तरह शेयर्स बेचने को एग्जिट कहते है और कई बड़ी कंपनियों में ऐसा हुआ है। पर आम तौर पर इन्वेस्टर्स चाहते है प्रमोटर्स कंपनी में मौजूद रहे। बहुत बार इन्वेस्टर्स प्रमोटर्स को एग्जिट करने के लिए एक लंबा समय तय करते है।

प्रमोटर्स अपने शेयर किसी बड़ी कंपनी को या फिर IPO के जरिये आम लोगों को बेच सकते है। IPO लाने की प्रक्रिया से ज्यादा लंबी होती है और इसके लिए किसी रजिस्टर्ड स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टिंग करनी होती है। पर इस प्रक्रिया के बाद कंपनी के शेयर्स खरीदी और बिक्री के लिए स्टॉक एक्सचेंज में उपलब्ध रहते है। IPO के बाद कंपनी के शेयर्स की एक पब्लिक वैल्यू होती है जो स्टॉक एक्सचेंज के सूचकांक में दर्शित होती है। यह वैल्यू शेयर्स की मांग और उपलब्धता के अनुसार बदलती है। आम तौर पर यह वैल्यू कंपनी के आर्थिक प्रदर्शन पर आधारित होती है क्योंकि इन्वेस्टर्स ऐसी कंपनी के शेयर्स खरीदना चाहते है जो अच्छा मुनाफा कराती है।
प्रमोटर्स अपने शेयर किसी बड़ी कंपनी को या फिर IPO के जरिये आम लोगों को बेच सकते है। IPO लाने की प्रक्रिया से ज्यादा लंबी होती है और इसके लिए किसी रजिस्टर्ड स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टिंग करनी होती है। पर इस प्रक्रिया के बाद कंपनी के शेयर्स खरीदी और बिक्री के लिए स्टॉक एक्सचेंज में उपलब्ध रहते है। IPO के बाद कंपनी के शेयर्स की एक पब्लिक वैल्यू होती है जो स्टॉक एक्सचेंज के सूचकांक में दर्शित होती है। यह वैल्यू शेयर्स की मांग और उपलब्धता के अनुसार बदलती है। आम तौर पर यह वैल्यू कंपनी के आर्थिक प्रदर्शन पर आधारित होती है क्योंकि इन्वेस्टर्स ऐसी कंपनी के शेयर्स खरीदना चाहते है जो अच्छा मुनाफा कराती है।

इस तीसरे पड़ाव के बाद प्रोमटर्स के शेयर्स की वैल्यू सीड राउंड से कई गुना ज्यादा होती है। और इस तरह बिना कुछ ज्यादा रकम लगाए प्रमोटर्स सिर्फ अपने आइडियाज और प्रबंधकीय क्षमताओ के आधार पर कुछ ही वर्षो में कई करोड़ो रुपये बना लेते है।

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