जानिये कैसे देसी बर्गर बेचकर दो दोस्तों ने बनाया 55 करोड़ के टर्न-ओवर का बिज़नेस

जानिये कैसे देसी बर्गर बेचकर दो दोस्तों ने बनाया 55 करोड़ के टर्न-ओवर का बिज़नेस

आप चाहे तो इटालियन शर्ट पहन लें, चाहे स्कॉटिश घड़ियाँ और चाहे तो आप अमेरिकन लैपटॉप का उपयोग कर लें पर अन्त में तो आप को भारतीय खाने की ही लालसा रहेगी। देसी नाश्ता और फास्ट-फूड अपने आप में एक पूरा उद्योग है परन्तु कोई भी इस क्षेत्रीय बाधाओं को तोड़ने और इन बाधाओं को तोड़कर पूरे देश की सेवा करने को कोई तैयार नहीं था। परंतु यही वह क्षेत्र है जिसको वेंकटेश अय्यर और शिवदास मेनन ने अपने इंटरप्रेन्योरशिप के लिए चुना।

अपने आइडिया को लेकर वेंकटेश कहते हैं कि एक दिन मैं जब काम से लौट रहा था तब मैंने वीटी स्टेशन के बाहर एक 40 फ़ीट बड़ा मैकडोनाल्ड का बैनर लगा देखा। बैनर के नीचे ही वड़ा-पाव का एक ठेला खड़ा था। मैं उसके पास गया और वड़ा-पाव ख़रीदा। वड़ा-पाव और बर्गर दोनों कई मायनो में एक से थे परंतु एक बहुत ही बड़ा ब्रांड था और एक अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहा था। इससे वेंकटेश को वड़ा-पाव के कारोबार में सफल होने के आसार दिखे।

और फिर इसी आइडिया से गोली वड़ा-पाव का जन्म हुआ। शुरुआत में लगभग 30 लाख रुपये का इन्वेस्टमेंट करना पड़ा। इसका नाम गोली इसलिए दिया गया क्योंकि इसमें मुम्बईया टच था जो इसे एक स्थानीय स्वाद दे रहा था। गोली का पहला शॉप साल 2004 में कल्याण में खोला गया और इसने तुरंत ही सफलता पाई। लोगों ने वेंकटेश और शिवदास को उसकी फ्रैंचाइज़ी खोलने के लिए एप्रोच किया और बहुत ही कम समय में पंद्रह और आउटलेट खुल गये।

“वड़ा-पाव अमिताभ बच्चन की तरह है जिसे कोई प्रचार की जरुरत नहीं है। यह अपने आप ही बिकता है l”
वड़ा-पाव के लिए न ही प्लेट की जरुरत होती और न ही स्पून की, यह फास्टफूड मुम्बई का सबसे पसंदीदा नाश्ता बन गया और इसके लिए किसी प्रचार की भी आवश्यकता नहीं पड़ी। लेकिन शुरुआत में इस कंपनी को बहुत नुकसान झेलना पड़ा। वड़ा-पाव की सबसे बड़ी समस्या उसके बर्बाद होने की थी। अगर 3000 बड़ा-पाव एक दिन में बना और उसमे से 2500 बिके तो लगभग 500 बड़ा-पाव की बर्बादी हो जाती थी, क्योंकि वड़े एक दिन से ज्यादा नहीं चल पाते और साथ ही कर्मचारियों द्वारा पाव और बड़ा चोरी होने का डर, कुक पर निर्भरता आदि बहुत सी समस्यायें थी, जो गोली को झेलनी पड़ी और इसलिए शुरुआत में बिज़नेस को काफ़ी नुकसान उठाना पड़ा।

एक दोस्त के सुझाव से वेंकटेश और शिवदास ने विस्टा फ़ूड से एप्रोच किया। यह एक भारतीय कंपनी है जो बहुत सारे फूडचेन के साथ काम करती है। उन्हें गोली की संकल्पना पसंद आई और उन्होंने बैक-एन्ड पार्टनरशिप की पेशकश की। इसके तहत वड़ा विस्टा फ़ूड से बनकर आएगा और बिना किसी आदमी की मदद के यह वड़ा मेटल डिटेक्टर्स और एक्स-रेज़ मशीन से गुजर कर बहुत ही उच्च स्तर का फ़ूड ग्राहकों तक पहुंचाया जायेगा।

विस्टा फ़ूड से बने वड़ा की शेल्फ-लाइफ लगभग नौ महीने की होती है। कोई भी भारतीय फास्टफूड बिज़नेस में इस तरह मानकी-करण नहीं किया जाता। यह सब बदलाव के बाद ग्राहकों का विश्वास दिनों-दिन बढ़ता गया और गोली बड़ा-पाव एक बड़े ब्रांड और क्विक सर्विस रेस्टोरेंट के रूप में अपनी पहचान बना सका।
गोली से प्रभावित होकर 2011 में चेन्नई के एक उद्योगपति ने 21 करोड़ का निवेश किया है। और गोली को यह अवसर दिया है कि यह अपनी बहुत सी शाखाएं देश के हर हिस्से में खोले। आज गोली देश के पंद्रह राज्यों के लगभग 61 शहरों में फैला हुआ है और इसके 275 आउटलेट्स हैं। यह अपने ग्राहकों को बहुत सारे फ्लेवर्स के वडा-पाव जैसे क्लासिक, समोसा, सेज़वान, पालक और कॉर्न आदि प्रदान करते हैं।

एक आईडिया जिसके फलस्वरूप कल्याण में एक अकेले शॉप से आज उनका वार्षिक टर्न-ओवर लगभग 55 करोड़ का हो गया है। वेंकटेश और शिवदास दोनों इसके लिए बहुत ही मेहनत कर रहे हैं और उनका लक्ष्य है कि आगे आने वाले समय में उनका टर्न-ओवर 200 करोड़ तक पहुँच जाये।

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