कैसे दो भाइयों ने मिलकर पिता के बटन बनाने के धंधे को 1700 करोड़ की एक नामचीन कंपनी में तब्दील किया

कैसे दो भाइयों ने मिलकर पिता के बटन बनाने के धंधे को 1700 करोड़ की एक नामचीन कंपनी में तब्दील किया

ब्रजलाल भाई एक अच्छे व्यवसाय के अवसर की तलाश में थे। दरअसल अपने ही गांव वे कुछ पार्टनर के साथ छोटे पैमाने पर धातु से बटन बनाने का कारोबार करते थे। उन दिनों, धातु बटन विशेषकर ब्रास बटन का फैशन की दुनिया में बड़ा बोलबाला था। इसी दौरान ब्रजलाल को अपने बिज़नेस पार्टनर के साथ कुछ कहा-सुनी हो गयी और फिर इन्होंने अपना खुद का कारोबार अकेले ही शुरू करने के उद्येश्य से मुंबई का रुख किये। वर्ष 1934 में मुंबई पहुँच इन्होंने एक छोटे से बटन बनाने की मशीन खरीदी और अपने दम पर बटन बनाने शुरू कर दिए। इन्होंने बटन बनाने वाली इस छोटी सी दुकान से शुरुआत कर 1700 करोड़ की नामचीन फर्नीचर कंपनी ‘नीलकमल’ की स्थापना कर डाली।

मेटल बटन बनाने की इनकी कंपनी अच्छी-खासी चलने लगी और इसी दौरान एक दिन इन्हें प्लास्टिक से बटन बनाने का आइडिया आया। दरअसल रंगीन प्लास्टिक बटन को बनाने में अपेक्षाकृत काफी कम लागत आते लेकिन 1950 के उस दौर में किसी ने प्लास्टिक के बारे में सुना तक नहीं था और ऐसे में इस कारोबार का भविष्य खतरे में होने की आशंका भी थी।

शुरुआत में, ब्रजलाल भाई के बेटे रंगीन बटनों को बेचने के लिए मुहम्मद अली रोड में स्थित बाजार में जाने शुरू कर दिए। शुरुआत में इसे बेचने के लिए इन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा लेकिन जल्द ही मांग में भारी बढ़ोतरी हुई। प्लास्टिक बटन की सफलता को देखते हुए ब्रजलाल भाई ने समझ लिया कि इस क्षेत्र में बड़े कारोबार की संभावना है। इसी को ध्यान में रखते हुए इन्होंने साल 1950 में विंडसर मशीन खरीदी बाज़ार में प्लास्टिक कप को पेश किया।

ब्रजलाल भाई के बेटे वमन पारेख बतातें हैं कि लोग प्लास्टिक के मग देखकर बेहद चकित हुए। यहाँ तक कि मीडिया का ध्यान भी प्लास्टिक मग ने अपनी ओर खींचा और कुछ दिनों के बाद अख़बारों की सुर्खियों में भी इसे जगह मिली। परिणामस्वरूप लोगों के बीच यह बेहद लोकप्रिय हो गया।

इस सफलता ने पारेख परिवार को सफलता के सबसे ऊँचे पायदान पर बिठा दिया। शुरूआती सफलता से इनके हौसलों को नई उड़ान मिली और साल 1964 तक इन्होंने और भी मशीने खरीदते हुए और नए उत्पाद जारी करने का फैसला किया। बड़ी मशीनों के आगमन के साथ, इन्होंने बड़े जल भंडारण ड्रम जैसे प्रोडक्ट बनाने की शुरुआत की।

साल 1981 में ब्रजलाल के दोनों बेटे वामन और शरद पारेख कंपनी की कमान अपने हाथों में लेते हुए नीलकमल प्लास्टिक्स की नींव रखी। यह एक सोचा हुआ नाम नहीं था दरअसल ऐसा हुआ कि 1970 में इन्होंने एक बिज़नेस यूनिट खरीदी उसका नाम नीलकमल था, इसलिए इन्होंने इसी नाम को जारी रखा। नीलकमल ने प्लास्टिक्स द्वारा बनाई गई सभी चीजों का निर्माण किया, जैसे बास्केट, पाइल्स, गिलास, लेकिन अपनी पहचान बनाने के लिए इन्होंने एक नए क्षेत्र में कदम रखने का निश्चय किया और वह था सामग्री प्रबंधन। सामग्री प्रबंधन की बात करें तो इसका मतलब हुआ ऐसे बक्से जो किसी कच्चे माल या कारखाने में बने उत्पादों के चलने के लिए उपयोग किए जाते हैं।

यहाँ पैठ ज़माने के बाद इन्होंने साल 2005 में खुदरा क्षेत्र में प्रवेश करते हुए तैयार फर्नीचर एक नई श्रृंखला शुरू की। सात साल पहले, जब तैयार फर्नीचर के लिए बाजार लगभग संतृप्त था, आयातित फर्नीचर के लिए ऐसी श्रृंखला शुरू करना काफी साहस साहस भरा कदम था।

आज नीलकमल के बनें उत्पाद देश के हर कोने में पहुँच चुका है। इतना ही नहीं देश के लगभग सभी छोटे-बड़े शहरों में इनकी आउटलेट्स है। कंपनी का सालाना टर्नओवर 1700 करोड़ के पार है।

इस नामचीन ब्रांड को बनाने के पीछे पिता-पुत्रों की कड़ी-मेहनत और समय-समय पर सही फैसले लेना ही है। इनकी सफलता से आने वाली पीढ़ी जो खुद का कारोबार शुरू करन चाहती है उन्हें अवश्य ही प्रेरणा मिलेगी।

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