कभी 1700 रूपये की नौकरी करने वाली लखनऊ की अंजलि आज है करोड़ों की कंपनी की मालकिन

कभी 1700 रूपये की नौकरी करने वाली लखनऊ की अंजलि आज है करोड़ों की कंपनी की मालकिन

अंजली सिंह का एयर होस्‍टेस बनने का सपना तो आम मध्‍यवर्गीय जीवन की बंदिशों की भेंट चढ़ गया, पर सपना देखने की आदत और हौसले को सहेज कर रखना उन्‍होंने नहीं छोड़ा, जिससे आज उनकी सफलता एक दूसरे तरह से खुले आसमान की ऊंचाईयों में उड़ान भर रही है। पिता में एक उद्यमी वाला स्‍वभाव था। उत्‍तर प्रदेश के लखनऊ के एक पारंपरिक सेट-अप में पली-बढ़ी अंजली ने एक लड़की होने से जुड़ी और मध्‍यवर्गीय तमाम तरह की बंदिशों को किनारे लगा दिया। अगर इन बंदिशों में से उन्होंने कुछ ग्रहण किया तो मात्र यह प्रेरणा कि अपने उद्यमों में हमेशा ही वह तमाम मज़बूर लड़कियों को साथ लेकर चलेंगी। अंजली ने पिता के प्‍यार, विश्‍वास और तिनका-तिनका जोड़कर बनाए हुए उद्यम को सहेजा और उसमें अपने प्‍यार, विश्‍वास, संवेदना, हौसला और सृजनात्‍मकता का अमृत डाल-डाल कर उसे खूबसूरत महल बना दिया। आज समाज और सरकार उन्‍हें पुरस्‍कारों से नवाज़ कर उनकी जवाबदेही और उद्यम को लगातार मान्‍यता दे रही है।

मध्‍यवर्गीय और अनेक सामाजिक अवगुंठनों से निकलने में वक्‍त लगता रहा। पर, हौसलों को रास्‍ता बनाना ही था और उसने बनाया। कभी अंजली मात्र 1700 रू. की नौकरी करती थीं। आज 38 वर्ष की उम्र में उनकी प्रमुख कंपनी का सलाना टर्नओवर 1 करोड़ रूपए से ऊपर है।
अंजली उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ से बाहर जाना चाहती थीं। एयरहोस्‍टेस बनना तो वह बचपन से चाहती ही थीं। पर, लड़की होना और खानदान में अकेली लड़की होना इसका कारण बना कि अंजली यह सब न कर पाईं। उन्‍होंने लखनऊ विश्‍वविद्यालय से ही एम.बी.ए. किया। साल 2001 में एम.बी.ए. की डिग्री के बाद उन्होंने लखनऊ के पास एक रिजॉर्ट में छोटी सी नौकरी कर ली और उसी वर्ष छोड़ भी दी। अंजली बताती हैं कि उन्‍होंने अच्‍छा-खासा वक्‍त छोटी-मोटी नौकरियों में जद्दोजहद करने में बिताया। उन्‍होंने 2001 से 2009 तक का समय एक ही जगह आईएसएफएआई यूनिवर्सिटी की लखनऊ शाखा में बिताया जहां उन्‍होंने काउंसलर पद से शुरुआत की और उन्हें छोटी-छोटी पदोन्‍नतियों ही मिली। 2009 में मिली मार्केटिंग मैनेजर के पद पर पदोन्‍नति भी मात्र 20 हजार रूपए प्रतिमाह वाली थी। जल्‍द ही उन्‍होंने यह काम भी छोड़ दिया। तबतक उन्‍हें यह बात समझ में आने लगा था कि पिता के एनजीओ के कुछ मूलभूत बातों को उठाकर कैसे एक बड़ा व्‍यवसायिक मॉडल बनाया जा सकता है। तबतक नियमित नौकरी से ऊब और कुछ नया करने का साहस उनमें संचित हो-हो कर परवान चढ़ चुका था।

पिता ने पहले ही उद्यमिता और सामाजिक सेवा का एक पौधा लगाया था जब उन्‍होंने बैंक की नौकरी छोड़कर भारतीय सेवा संस्‍थान नाम से एक एनजीओ शुरू किया था। पिता के एनजीओ को भारत सरकार के वस्‍त्र मंत्रालय से जूट के तरह तरह का सामान बनाने का काम मिला था। अंजली के पिता के एनजीओ के शबनम को साथ लिया और जुट गईं। जल्‍द ही वह समझ गईं कि उनके गोल्‍डन सपनों को इसी गोल्‍डन फाइबर ‘जूट’ का इंतजार था। वह कामगार महिलाओं को जोड़ती गईं और सरकार की अलग-अलग परियोजनाओं और बाजार से डिमांड प्राप्‍त कर जूट उत्‍पाद बनाने और बेचने का सिलसिला शुरू किया। यह सिलसिला चल पड़ा। अपनी कंपनी की नींव उन्होंने एक सरकारी बैंक से 15 लाख रूपए लोन लेकर शुरू की थी।

अंजली ने निम्‍न वर्ग की महिलाओं को प्रशिक्षण देकर रोजगार देने का काम किया। प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष तरीके से वह करीब 500 महिलाओं को प्रशिक्षित कर स्‍वरोजगार से जोड़ चुकी हैं। उन्‍होंने अपने उद्यम के माध्‍यम से जूट को बढ़ावा देने के साथ- साथ गरीब वर्ग की महिलाओं को प्रशिक्षण और रोजगार देने संबंधी राज्‍य और केंद्र सरकार की अनेक योजनाओं को गति देने का काम किया है। फिक्‍की के महिला आर्गेनाइजेशन से भी उन्‍होंने अनेक प्रकार के सहयोगों को मोबिलाइज किया। प्रशिक्षण के माध्‍यम से रोजगार से जोड़ने के काम में वह मिशन मोड से लगी हैं। सुनहरे रेशे जूट से उनका प्‍यार परवान चढ़ते हुए यहां तक पहुंच चुका है कि अंजली ने अभी हाल में ही भारतीय सेवा संस्थान एनजीओ को जूट आरटीशियन्स गिल्ड प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के तौर पर रजिस्टर्ड करा लिया है। आज इस कंपनी की लखनऊ में ही 4 शाखाएं हैं, जिसमें 200 से ज्यादा महिलाएं काम करती हैं। इस कंपनी का सलाना टर्नओवर 1 करोड़ के पार है।

अंजली अपनी सफलता का मंत्र यह बताती हैं कि अपनी विरासत को अच्‍छी तरह से अपनी ताकत बनाकर अपनी सीमाओं को भी नया सीखकर सीमाओं से बाहर निकलने का अवसर बना लिया जाए। फिर, अपने सपनों के साथ दूसरे अनेक लोगों विशेषकर कमजोर तबकों के लोगों के सपनों को जोड़ लिया जाए और समान उद्देश्‍य से काम करने वाली संस्‍थाओं की मदद ली जाए।

अंजली सिंह की सफलता समाज के सभी वर्गों के लिए सीख है। उनकी अपनी महत्‍वाकांक्षाएं न सिर्फ समाज की आकांक्षाओं और जरूरतों को साथ लेकर चलती हैं बल्कि समाज की जरूरतों में से अपने लिए अवसर बनाती हैं। इसलिए यह आश्‍चर्यजनक नहीं है कि उनकी सफलताओं को पुरस्‍कारों के रूप में विशेष पहचान भी मिल रही है। एक बहुत ही प्रतिष्ठित अवार्ड आउटस्टैंडिंग वुमन आंत्रेप्रेन्योर के लिए फिक्की फ्लो अवॉर्ड 29 अप्रैल 2017 को गवर्नर राम नाइक के हाथों दिया गया। इसी वर्ष महिला दिवस के दिन उन्‍हें लखनऊ मैनेजमेंट एसोशिएशन का बेस्ट वुमन आंत्रेप्रन्योर अवॉर्ड तथा इस्टर्न मसाला कंपनी की तरफ से भी बेस्ट विमेन आंत्रेप्रेन्योर अवॉर्ड दिया गया। उन्‍हें इसी वर्ष मई में एचटी मीडिया की ओर से पुरस्‍कारों के लिए नामांकित किया गया था।

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