इंजीनियर की सफल नौकरी छोड़ शुरू किया स्टार्टअप, कुछ ही वर्षों में बना लिया 60 करोड़ का एम्पायर

इंजीनियर की सफल नौकरी छोड़ शुरू किया स्टार्टअप, कुछ ही वर्षों में बना लिया 60 करोड़ का एम्पायर

आज भारत में युवाओं के बीच अपना स्‍टार्टअप का क्रेज़ काफी बढ़ गया है। रिसर्च की मानें तो बड़ी संख्‍या में युवा अपनी लाखों की सैलरी वाली जॉब छोड़कर अपना खुद का स्‍टार्टअप शुरु कर रहे हैं। इसके पीछे की वजह का जिक्र करें तो स्टार्टअप के जरिए आपके काम को पहचान मिलती है। युवा वर्गों की यह चाह होती है कि दुनिया उनके भी टैलेंट को देखे और उसकी सराहना करे। इतना ही नहीं नई पीढ़ी के युवा जहाँ अपनी आइडिया से एक सफल स्टार्टअप की आधारशिला रखते हैं वहीं यह मौजूदा दौर की एक बड़ी जरुरत को भी पूरा कर देता है।

आज हम ऐसे ही एक सफल स्टार्टअप की कहानी लेकर आए हैं जिसकी शुरुआत एक युवा इंजीनियर ने अपनी सक्सेस जॉब छोड़कर की थी। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आज यह देश के एक सफल स्टार्टअप की सूची में शामिल है और इसका सालाना टर्नओवर 60 करोड़ के पार है।

बायोटेक्नोलॉजी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले 25 वर्ष के पारस चोपड़ा को बचपन से ही कंप्यूटर में बेहद रुचि थी। पंजाब के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्में और पले-बढ़े पारस के पिता अपने ऑफिसियल काम के लिए कंप्यूटर का इस्तेमाल करते थे। पिता को इस्तेमाल करता देख कम उम्र में ही इनके भीतर भी उसे इस्तेमाल करने की जिज्ञासा पैदा हुई और करीब 13 वर्ष की उम्र में, जब दूसरे बच्चे कम्प्यूटर पर गेम खेला करते हैं, पारस प्रोग्रामिंग करने लगे। स्कूल की पढ़ाई पूरी करते-करते पारस प्रोग्रामिंग में माहिर हो चुके थे। कंप्यूटर में बेहद दिलचस्पी होने के बावजूद उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए बायोटेक्नोलॉजी को चुना।

पारस बताते हैं कि स्कूल के दिनों में ही उन्हें ‘हाउ टु स्टार्ट ए स्टार्टअप’ पर एक लेख पढ़ने का मौका मिला जिसने उन्हें स्टार्टअप के लिए काफी प्रेरित किया था। अपने इसी आकर्षण के चलते उन्होंने कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही तीन-चार अलग-अलग स्टार्टअप्स में भी अपना हाथ आजमाया, लेकिन एक बिजनेस मॉडल के अभाव में ये बिजनेस में तब्दील नहीं हो पाया।

साल 2008 में सफलतापूर्वक इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने बतौर इंजिनियर अपने कैरियर की शुरुआत की। लेकिन उनके जेहन में कहीं न कहीं खुद का स्टार्टअप शुरू करने की ललक अब भी कायम थी। जॉब के साथ ही उन्होंने अपने आस-पास कारोबार की संभावनाओं को तलाशते रहे। इस दौरान उन्होंने अपनी रूचि के क्षेत्रों पर खासा ध्यान दिया और एनालिटिक्स, टेक्नोलॉजी और मार्केटिंग के मिश्रण वाले एक प्रोजेक्ट की रूप-रेखा तैयार की।

पारस के पास मार्केटिंग का बिलकुल अनुभव नहीं था लेकिन फिर भी उन्होंने कुछ नया सीखने और करने की चाहत में इस फील्ड को चुना। मजबूत आत्मबल के साथ उन्होंने जॉब के साथ-साथ ही प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया। उनका मकसद गूगल एनालिटिक्स के लिए एक प्लेटफॉर्म तैयार करने का था जिसका इस्तेमाल यूजर अपनी वेबसाइट को बेहतर बनाने और उसके ऑप्टिमाइजेशन के लिए कर सकें। करीबन आठ महीनों के अथक परिश्रम के बाद साल 2010 में विजुअल वेबसाइट ऑप्टिमाइजर नाम से उन्होंने अपने सॉफ्टवेयर को लॉन्च किया।

यह उत्पाद इतना जबरदस्त था कि लांच होने के कुछ ही महीनों में इसे करोड़ों लोगों का प्यार मिला और उनकी पैरेंट कंपनी ‘विंगिफाय’ दुनियाभर के शीर्ष एनालिटिकल सॉफ्टवेयर प्रोवाइडर्स में शामिल हो गई। सफलता को देखते हुए उन्होंने जॉब छोड़कर अपना पूरा ध्यान इसी पर केंद्रित करते हुए कंपनी को नए पायदान पर बिठा दिया। जनवरी, 2011 तक कंपनी का टर्नओवर 18,83,548 रुपए (30,000 डॉलर) पहुंच गया, जो आज करीब 62,78,49,500 रुपए (10 मिलियन डॉलर) के आंकड़े को पार कर चुका है। इतना ही नहीं वर्तमान में 40 से ज्यादा कर्मचारियों के साथ विंगिफाय क्लियरट्रिप, माइक्रोसॉफ्ट, जनरल इलेक्ट्रिक, ग्रुपऑन, एयरबीएनबी, वॉल्ट डिजनी और होटल्स डॉट कॉम जैसे दुनिया भर के करीब 7,500 कस्टमर्स को अपनी सेवाएं प्रदान कर रहा है।
सैलरी के कुछ हिस्से से शुरू हुई यह कंपनी आज दुनिया की एक सफल स्टार्टअप बन चुकी है। पारस के पास अच्छी-खासी नौकरी थी, वह चाहते तो मौज से अपनी जिंदगी जी रहे होते लेकिन उन्होंने खुद के भीतर कुछ बड़ा करने की प्रेरणा को हमेशा जिंदा रखा और आज हमारे सामने एक सफल व्यक्तित्व के रूप में खड़े हैं।

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