कैसे मैनें 500 रूपये प्रति महीने की पगार से 55 लाख रूपये के पैकेज तक का सफर तय किया

कैसे मैनें 500 रूपये प्रति महीने की पगार से 55 लाख रूपये के पैकेज तक का सफर तय किया

संघर्ष जितना कठिन होता है जीत उतनी ही शानदार होती है। इस व्यक्ति ने जिंदगी में बहुत ज़्यादा संघर्ष झेला है; कुछ भी इनके लिए आसान नहीं था। परिस्थितियों की मार ने उन्हें दसवीं पास करने के तुरंत बाद काम करने के लिए मजबूर कर दिया था। इसने कुरियर बॉय की एक छोटी सी नौकरी कर महीने में मात्र 500 रूपये कमाना शुरू किया। उन्हें सारी चीजें बेरंग नज़र आती थी पर आज एक सम्मानित अफ्रीकन कंपनी में 55 लाख रूपये के वार्षिक पैकेज पर नौकरी का ऑफर उन्हें मिल चुका है। यह कहानी उनके हौसलों के उड़ान की कहानी है।

देवेंद्र दवे को इनके दोस्त और परिवार वाले प्यार से दवे पुकारते हैं। मुम्बई के विरार में इनका बचपन बीता था। इनके पिता एक पोलियो के मरीज थे। अपने परिवार को आर्थिक संकट से उबारने के लिए उनकी मां दूसरों के घर खाना बनाने का काम करती थीं। घर का बोझ हल्का करने के चलते उनके पिता एक आकस्मिक वित्तीय घोटाले में फंस गए और उसकी भरपाई के लिए उन्हें आठ लाख देना था। यह इतनी बड़ी रकम थी जिसे चुकाने के लिए उन्हें अपना घर तक बेचना पड़ा। संपत्ति के नाम पर यही एक धरोहर थी उनके पास। कठिन समय आया और चला गया किन्तु उसकी पीड़ा आज भी जेहन में अब भी थी।

दसवीं की परीक्षा के तुरंत बाद ही अपने परिवार की आय बढ़ाने के लिए इन्होंने एक कुरियर कंपनी में मात्र 500 रुपये महीने की तनख्वाह पर नौकरी शुरू कर दी। मुम्बई की सड़कों पर घूमते हुए उन्होंने शिक्षा के महत्त्व को महसूस किया और उन्होंने एक अच्छे कॉलेज में अपना दाखिला ले लिया। जब वे बारहवीं कक्षा में थे तो इसी दौरान उनके पिता की नौकरी उनके स्वास्थ्य की वजह से छूट गई।

घर की सारी जिम्मेदारी उनके नन्हें कन्धों पर आ गई। वे बहुत सारे छोटे-मोटे जॉब के साथ कई एंट्रेंस टेस्ट भी देते रहते थे। 2014 में उन्होंने अपने सपनों के कॉलेज मुद्रा इंस्टिट्यूट ऑफ़ कम्युनिकेशन अहमदाबाद का एंट्रेंस टेस्ट पास कर लिया। लेकिन कोई बैंक लोन देने को तैयार नहीं था क्योंकि उनके पिता एक वित्तीय घोटाले में फंस जो हुए थे। उन्होंने हर बैंक के दरवाज़े खटखटाये पर निराशा ही हाथ लगी। बहुत निराश हो गए क्योंकि एक बहुत ही अच्छा अवसर उनके हाथ से फिसलता जा रहा था।

उदास मन से फिर वह अपने नौकरी पर वापस आ गए और फिर से पैसे की बचत कर अपने परिवार के पास जमा करने लगे। बहुत सारे छोटे-मोटे जॉब करने के बाद उन्होंने शतरंज सीखना शुरू किया। एक दिन एक विद्यार्थी के पिता ने यह पेशकश की कि अगर वे एंट्रेंस परीक्षा पास कर लें तो ट्यूशन फीस में वो उनकी मदद करेंगे। इस घटना ने उनमें जान डाल दी और वह तैयारी में जुट गए। उन्होंने अपना शत-प्रतिशत दिया और 2015 के MICA की एंट्रेंस परीक्षा पास कर ली।

और यहीं से उनकी जिंदगी ने करवट बदली। उन्होंने हफ्ते के सातों दिन काम करके जो 2.5 लाख रूपये बचाये थे, उसे लेकर वे अहमदाबाद चले आये। वहाँ पढ़ाई करते हुए उन्होंने बहुत सारी प्रतियोगिताओं में भाग लिया और नकद पुरस्कार भी प्राप्त किये। देवेंद्र ने अपना एक छोटा सा स्टार्ट-अप भी खोला जिसमें वह विद्यार्थियों को प्रेरित करते और MICA की परीक्षा पास करने में उनकी मदद भी करते। नकद पुरस्कार और स्टार्ट-अप के जरिये मिले पैसे से दो साल तक उन्होंने अपने परिवार की मदद की।

देवेंद्र दवे ने टीम केनफ़ोलिओज़ से बातचीत के दौरान बताया कि “मेरी सारी मेहनत तब सफल हो गई जब मैंने एक अफ्रीकन कंपनी के इंटरव्यू को पास किया। उन्होंने मुझे 55 लाख रूपये के वार्षिक पैकेज की पेशकश की और कुछ ही महीनों के अंदर मैं नौकरी ज्वाइन करने वाला भी हूँ। जब मेरे हाथ में ऑफर लेटर आया तब मुझे लगा कि इतने सालों तक जो परिवार ने कष्ट सहा उससे उबरने का समय अब आ गया है। मेरा हर संघर्ष मुझे कड़ी से कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरित करता है। मेरा मानना है कि जो अपने सपनों पर विश्वास करता है वह हमेशा सफल होता है।”

Post a Comment

0 Comments